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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 198
न धर्मस्यापदेशेन पापं कृत्वा व्रतं चरेत्‌ । व्रतेन पापं प्रच्छाद्य कुर्वन्‌ स्त्रीशूद्रदम्भनम्‌ ।।
धर्म से पाप को छिपाकर (मेरा पाप चान्द्रायण, सन्तापन आदि व्रतरूप प्रायश्चित्तो से छूट जायेगा ऐसा समझकर) स्त्रियों तथा शूद्रों (धर्म के अनभिज्ञो ) के सामने पाखण्ड करता हुआ मनुष्य धर्म के बहाने से (मैं धर्म के लिये इन चान्द्रायणादि व्रतों को कर रहा हुँ, यह प्रायश्चित्त नहीं है, इस प्रकार के बहाने से) पाप को न करे।
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