आचार्य च प्रवक्तारं पितरं मातरं गुरुम् । न हिंस्याद् ब्राह्मणान् गाश्च सर्वाश्चैव तपस्विनः ।।
आचार्य (२।१४०), वेंदादि का व्याख्यानकर्ता, पिता, माता, गुरु (२।१४२), ब्राह्मण, गौ और सब (प्रकार के) तपस्वी; इनकी हिंसा (इनके प्रतिकूल आचरण) न करे।
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