अशुद्ध (जूठे मुँह रहकर तथा मल-मूत्र त्यागकर) इन (गौ, ब्राह्मण और अग्नि) का हाथ से स्पर्शकर पाणितल (तलहथी) पर पानी रखकर उससे प्राणों नेत्रादि इन्द्रियों (शिर, कन्धा, घुटना चरणों) एवं सम्पूर्ण शरीर और नाभि का स्पर्श करे।
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