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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 254
गुरून्भृत्यांश्चोज्जिहीर्षन्नर्चिष्यन्‌ देवतातिथीन्‌ । सर्वतः प्रतिगृह्णीयान्न तु तृप्येत्स्वयं ततः ।।
क्षुधा-पीड़ित गुरु (माता, पिता, उपाध्यायादि गुरुजन) और भृत्य (तथा स्री का उद्धार) (उन्हें भिक्षात्र द्वारा सन्तुष्ट) अर्थात्‌ क्षुधा-निवृत्त करने तथा देवता आदि की पूजा करने के लिये (पतित को छोड़) सबसे भिक्षा ग्रहण करे; किन्तु उस भिक्षा वस्तु से स्वयं सन्तुष्ट न हो अर्थात्‌ उस भिक्षा वस्तु को अपने काम में न लावे।
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