धर्म शनैः सञ्चिनुयाद्ठल्मीकमिव पुत्तिकाः । परलोकसहायार्थं सर्वभूतान्यपीडयन् ।।
जिस प्रकार दीमक वल्मीक (वामी-दियकाँड़) का सञ्चय करते हैं, उसी प्रकार परलोक की सहायता के लिये सब जीवों को पीड़ा नहीं देते हुए धीरे-धीरे धर्म का सञ्चय करे।
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