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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 151
दूरादावसथान्मूत्रं दूरात्पादावसेचनम्‌ । उच्छिष्टान्ननिषेकं च दूरादेव समाचरेत्‌ ।।
अग्निगृह अर्थात्‌ अग्निहोत्रशाला से (नेत्रत्य दिशा में छोड़ा हुआ बाण जहाँ तक जाय उतनी) दूर पर मूत्र (और मल का त्याग) करे, पादप्रक्षालन करे, जूठे अन्न (पत्तल आदि) को फेंके तथा वीर्य त्याग करे।
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