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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 221
य एतेऽन्ये त्वभोज्यान्नाः क्रमशः परिकीर्तिताः । तेषां त्वगस्थिरोमाणि वदन्त्यन्नं मनीषिणः ।।
प्रत्येक नामकथनपूर्वक इन अभोज्यान्नों (जिनका अन्न अभोज्य है) के अतिरिक्त जो अभोज्यान्न क्रमशः कहे गये हैं, उनके अन्न को विद्वान्‌ लोग उन (अभोज्यान्नों) को चमड़ा, हड्डी और रोम कहते हैं (उनका अन्न खाने को उनके चमड़ा, हड्डी और रोम (बाल) खाने के समान कहते हैं)।
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