सत्य, धर्म, सदाचार और पवित्रता में सर्वदा अनुराग (श्रद्धा) करे तथा वचन, बाहु और उदर (पेट) के विषय में संयत रहता हुआ शिष्यों से (शासन के योग्य स्री, दास, पुत्रादि तथा छात्रों का धर्म से ८।२९९) शासन (दण्डित) करे।
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