मङ्गल (गोरोचनादि मङ्गल द्रव्य-विशेष) तथा आचार (गुरुसेवा आदि) से युक्त, बाहर (मिट्टी जलादि से) - भीतर (राग-द्वेषादि-त्याग से) शुद्ध, जितेन्द्रिय और निरालस होकर सर्वदा (गायत्री का) जप करे तथा हवन करे।
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