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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 145
मङ्गलाचारयुक्तः स्यात्प्रयतात्मा जितेन्द्रियः । जपेच्च जुहुयाच्चैव नित्यमग्निमतन्द्रितः ।।
मङ्गल (गोरोचनादि मङ्गल द्रव्य-विशेष) तथा आचार (गुरुसेवा आदि) से युक्त, बाहर (मिट्टी जलादि से) - भीतर (राग-द्वेषादि-त्याग से) शुद्ध, जितेन्द्रिय और निरालस होकर सर्वदा (गायत्री का) जप करे तथा हवन करे।
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