न विस्मयेत तपसा वदेदिष्ट्वा च नानृतम् । ` नातोऽ प्यपददेद्विप्रान्न दत्वा परिकीर्तयेत् ।।
तपस्या से विस्मय (चान्द्रायण या कृच्छ आदि कठिन तपस्या की पूर्णता होने पर देखो किस प्रकार मैंने इसे पूरा कर लिया ऐसी भावना) न करे, यज्ञ करके असत्य न बोले, पीड़ित होकर भी ब्राह्मणों को दुर्वाच्य न कहे और दान देकर नहीं कहे।
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