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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 186
प्रतिग्रहसमर्थोऽपि प्रसङ्गं तत्र वर्जयेत्‌ । प्रतिग्रहेण ह्यस्याशु ब्राह्यं तेजः प्रशाम्यति ।।
(विद्यातप आदि के कारण) दान लेने में समर्थ होता हुआ भी (यथाशक्य) उसके प्रसङ्ग का त्याग करे (परिवारादि के पालन चलते रहने पर भी बार-बार लोभवश दान न लेवे); क्योंकि इस (दान लेने वाले) का ब्रह्म तेज दान लेने से शीघ्र शान्त हो जाता है (दान लेने से ब्राह्मण तेजोहीन हो जाता है)।
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