मनुष्य अधर्म कर (दूसरे से वैर बाँधकर, झूठी गवाही आदि देकर) पहले उन्नति करता है, बाद में कल्याण (बान्धव, भृत्य, धन-धान्यादि का सुख) देखता है फिर शत्रुओं पर विजय पाता है और (कुछ समय के बाद ही) समूल (बान्धव, भृत्य और धनधान्यादि के सहित) नष्ट हो जाता है।
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