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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 142
न स्पृशेत्पाणिनोच्छिष्टो विप्रो गोब्राह्मणानलान्‌ । न चापि पश्येदशुचिः स्वस्थो ज्योतिर्गणान्दिवि ।।
उच्छिष्ट मुख (जूठे मुंह) रहकर (तथा मलमूत्र त्यागकर) गौ, ब्राह्मण और अग्नि का हाथ से स्पर्श न करे और अपवित्र रहते हुए स्वस्थावस्था में आकाश में सूर्य, चन्द्र, ग्रह, तारा आदि को न देखे ।
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