मङ्गलाचारयुक्तानां नित्यं च प्रयतात्मनाम् । जपतां जुह्वतां चैव विनिपातो न विद्यते ।।
मङ्गल द्रव्य और आचार से युक्त, नित्य बाहरी-भीतरी शुद्धि रखने वाले, (गायत्री का) जप तथा हवन करते हुए द्विज का विनिपात (दैवकृत या मनुष्यकृत उपद्रव) नहीं होता है।
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