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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 111
यावदेकानुदिष्टस्य गन्धो लेपश्च तिष्ठति । विप्रस्य विदुषो देहे तावद्ब्रह्म न कीर्तयेत्‌ । ।
जब तक विद्वान्‌ ब्राह्मण के शरीर में एकोद्दिष्ट के कुंकुमादि का गन्ध या ल्लेप रहे, तब तक वह वेद का अध्ययन न करे।
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