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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 210
स्तेनगायनयोश्चान्नं तक्ष्णो वार्धुषिकस्य च । दीक्षितस्य कदर्यस्य बद्धस्य निगडस्य च ।।
चोर, गायक (मल्लिक, गन्धर्व आदि), बढ़ई, व्याजखोर, यज्ञ में दीक्षित (अग्निसोमीय के पहले), कृपण और निगड (कथकड़ी आदि) से बँधे हुए इनके (अन्न को न खावे)।
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