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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 119
उपाकर्मणि चोत्सगें त्रिरात्रं क्षेपणं स्मृतम्‌ । अष्टकासु त्वहोरात्रमृत्वन्तासु च रात्रिषु ।।
उपाकर्म (श्रावणी कर्म, और उत्सर्ग) (वेदोत्सर्ग ४।६१) कर्म में तीन रात (दिन-रात) का अनध्याय होतां है । मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा के बाद तीन (या चार) अष्टमी तिथियों और ऋतु के अन्त में एक दिन-रात का अनध्याय होता है।
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