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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 196
अधोदृष्टिनैष्कतिकः स्वार्थसाधनतत्परः । शठो मिथ्याविनीतश्च बकव्रतचरो द्विजः ।।
(अपनी साधुता की प्रसिद्धि के लिए सर्वदा) नीचे देखने वाला, निष्छुरता का व्यवहार करने वाला, अपने मतलब को सिद्ध करने में तत्पर, शठ, कपट युक्त (झूठा) विनय वाला द्विज 'बकत्रतचर' (बकब्रतिक) कहा गया है।
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