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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 184
आकाशेशास्तु विज्ञेया बालवृद्धकृशातुराः । भ्राता ज्येष्ठः समः पित्रा भार्या पुत्रः स्वका तनुः ।।
बालक, वृद्ध, दुर्बल और रोगी आकाशलोक के स्वामी हें (अतएव इन आचार्य आदि (४।१८२ से यहाँ तक वर्णित लोगों) के साथ वाक्कलह (बकवाद) नहीं करने पर वे लोग सन्तुष्ट होकर अपने-अपने लोकों (ब्रह्मलोक आदि) को देते हैं । बड़ा भाई पिता के समान है तथा स्री और पुत्र तो अपने शरीर ही हैं (अत: इनके साथ विवाद करना सर्वथा निन्द्य है)।
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