त्रिष्वप्येतेषु दत्तं हि विधिनाऽप्यर्जितं धनम् । दातुर्भवत्यनर्थाय परत्रादातुरेव च ।।
इन तीनों (बैडालत्रतिक, बकव्रतिक, और वेदज्ञानहीन) के लिये दिया गया विधिपूर्वक भी उपार्जित धन दानकर्ता तथा दानग्रहीता के लिये परलोक में अनर्थ (नरक प्राप्ति) के लिये होता है।
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