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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 14
वेदोदितं स्वकं कर्म नित्यं कुर्यादतन्द्रितः । तद् हि कुर्वन् यथाशक्ति प्राप्नोति परमां गतिम् ॥
वह बिना आलस्य के सदैव वेद में बताए अनुसार अपना कर्तव्य निभाएगा। अपनी सर्वोत्तम क्षमता से उसका पालन करते हुए वह सर्वोच्च गति को प्राप्त करता है।
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