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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 167
अयुध्यमानस्योत्पाद्य ब्राह्मणस्यासृगङ्गतः । दुःखं सुमहदाप्नोति प्रेत्याप्राज्ञतया नरः ।।
शास्रज्ञान के कारण मनुष्य युद्ध नहीं करने वाले ब्राह्मण के शरीर से (दण्डताड़नादि द्वारा) रक्त गिराकर मरने पर बहुत भारी दुःख पाता है।
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