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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 178
येनास्य पितरो याता तेन याताः पितामहाः । तेन यायात्सतां मार्ग तेन गच्छन्न रिष्यति ।।
(अनेक प्रकार के शास्त्रीय विकल्पों या अर्थो के कारण संदेह उपस्थित होने पर मनुष्य) जिस मार्ग से इसके पिता और पितामह (बाप-दादा) चले हैं, (उन अनेक विकल्प धर्म कार्यों में से जिस धर्म कार्य को किये हैं), उसी सज्जनो के मार्ग से चले ऐसा करने से मनुष्य अधर्म से हिंसित (पीडित) नहीं होता हे (उस कार्य के धर्मानुकूल होने से वह मनुष्य दुःखित नहीं होता है)।
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