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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 207
मत्तक्रुद्धातुराणां च न भुञ्जीत कदाचन । केशकीटावपन्नं च पदा स्पृष्टं च कामतः ।।
मतवाले, क्रुद्ध (क्रोधयुक्त) और रोगी के अन्न को, एवं केश या कीट (कीड़े) से दूषित अन्न को तथा इच्छापूर्वक पैर से छुए गये अन्न को कभी न खावे।
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