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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 212
चिकित्सकस्य मृगयोः क्रूरस्योच्छिष्टभोजिनः । उग्रान्नं सूतिकान्नं च पर्याचान्तमनिर्दशम्‌ ।।
वैद्य, शिकारी या व्याधा, क्रूर, जूठा खाने वाला, उग्र स्वभाव वाला; इनके अन्न को एवं सूतिका के उद्देश्य से पकाये हुए अन्न को, पर्याचान्त अन्न को और सूतक के अन्न को न खावे।
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