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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 201
परकीयनिपानेषु न स्नायाद्धि कदाचन । निपानकर्तुः स्नात्वा तु दुष्कृतांशेन लिप्यते ।।
दूसरों के बनवाये हुए जलाशय (पोखरा, बावड़ी, कूआँ आदि) में कभी स्नान न करे । और स्नान कर उक्त जलाशय बनवाने वाले के पाप के (चौथाई) भाग से (स्नान करने वाला मनुष्य) युक्त होता है।
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