मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 219
कारुकान्नं प्रजां हन्ति बलं निर्णेजकस्य च । गणान्नं गणिकान्नं च लोकेभ्यः परिकृन्तति ।।
बढ़ई (या शिल्पी) का अन्न संतान को तथा रँगरेज (कपड़ा रंगने वाला) का अन्न बल को नष्ट करता है और गण (सामूहिक) तथा वेश्या का अन्न (पुण्य आदि से प्राप्त होने वाले स्वर्ग आदि) लोकों से भ्रष्ट करता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मनुस्मृति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

मनुस्मृति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें