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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 3
यात्रामात्रप्रसिद्ध्यर्थं स्वैः कर्मभिरगर्हितैः । अक्लेशेन शरीरस्य कुर्वीत धनसञ्चयम् ॥
केवल भरण-पोषण की सिद्धि के लिए, शरीर को कष्ट पहुंचाए बिना, अपने स्वयं के अशोध्य व्यवसायों के माध्यम से धन संचय करना चाहिए।
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