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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 149
पौर्विकीं संस्मरन्‌ जातिं ब्रह्मैवाभ्यस्यते द्विजः । ब्रह्माभ्यासेन चाजस्रमनन्तं सुखमश्नुते ।।
(इससे वह) पूर्वजाति का स्मरण करता हुआ, (जन्मजन्य जरामरणादि विविध क्लेशों का स्मरण करता हुआ उससे छुटकारा पाने के लिए) फिर ब्रह्म का ही (श्रवण, मनन और ध्यान के द्वारा) निरन्तर अभ्यास करता है और ब्रह्माभ्यास से परमानन्द की प्राप्तिरूप अनन्त सुख (मोक्ष) को प्राप्त करता है।
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