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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 122
अतिथिं चाननुज्ञाप्य मारुते वाति वा भूशम्‌ । रुधिरे च खुते गात्राच्छस्त्रेण च परिक्षते ।।
अतिथि से बिना कहे, तेज हवा के बहते रहने पर, शरीर से रक्त बहने पर, शस्त्र से क्षत होने पर (वेदाध्ययन न करे)।
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