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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 137
नात्मानमवमन्येत पूर्वाभिरसमृद्धिभिः । आमृत्योः श्रियमन्विच्छेन्नैनां मन्येत दुर्लभाम्‌ ।।
पहले (उद्योग करने पर भी) समृद्धि न होने पर (मैं मन्दभाग्य या अभागा हूँ इत्यादि प्रकार से) अपना अपमान न करे, (किन्तु) मरने तक लक्ष्मी को चाहे (उन्नति के लिए उद्योग करता ही रहे), और इसे (समृद्धि-संपत्ति को) दुर्लभ कभी न समझे।
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