न फालकृष्टे न जले न चित्यां न च पर्वते ।
न जीर्णदेवायतने न वल्मीके कदा चन ॥
न जुती हुई ज़मीन पर, न पानी में, न भट्टी पर, न पहाड़ पर, न टूटे हुए मंदिर में, न चींटी-टीले पर।
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