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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 112
शयानः प्रौढपादश्च कृत्वा चैवावसक्थिकाम्‌ । नाधीयीतामिषं जग्ध्वा सूतकान्नाद्यमेव च ।।
(शय्या-पलंग आदि पर) लेट कर, पैर फैलाकर, घुटनों (टखनों) को नीचे की ओर मोड़कर और मांस को तथा सूतक (जन्म-मृत्यु-जन्य आशौच) के अन्न को खाकर वेदाध्ययन न करे।
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