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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 138
सत्यं ब्रूयात्प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात्सत्यमप्रियम्‌ । प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः ।।
सत्य (जैसा देखा है वैसा) बोले, प्रिय (तुम्हें पुत्र हुआ है, तुम परीक्षा में उत्तीर्ण हो गये इत्यादि प्रीतिजनक वचन) बोले, सत्य भी अप्रिय (जैसे - तुम्हारा पुत्र मर गया, तुम फेल हो गये' इत्यादि दुःखजनक वचन) न बोले और प्रिय भी असत्य (वचन) न बोले; यही सनातन (वेदमूलक होने से अनादि काल से चला आता हुआ) धर्म है।
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