न कदाचिदद्विजे तस्माद्विद्वानवगुरेदपि । न ताडयेत्तृणेनापि न गात्रात्त्रावयेदसूक् ।।
इस कारण विद्वान् मनुष्य ब्राह्मण के ऊपर डण्डा आदि कभी न उठावे, उसका तृण से भी ताडून न करे और न उसके शरीर से (शस्र-प्रहारादि द्वारा) रक्त बहावे।
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