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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 228
यत्किञ्चिदपि दातव्यं याचितेनानसूयता । । उत्पत्स्यते हि तत्पात्रं यत्तारयति सर्वतः ।।
याचना करने पर मनुष्य को असूयारहित होकर कुछ भी (यथाशक्ति) दान करना चाहिए; क्योंकि (इस प्रकार सर्वदा दान करने वाले) दाता के पास कभी वह पात्र आ जायेगा, जो सब (नरक के कारणों) से छुड़ा देगा।
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