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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 200
अलिङ्गी लिङ्गिवेषेण यो वृत्तिमुपजीवति । स लिङ्किनां हरत्येनस्तिर्यग्योनौ च जायते ।।
ब्रह्मचारी या संन्यासी आदि नहीं होता हुआ भी जो उनके चिह्न (दण्ड कमण्डलु-कषायवसत्रादि) को धारण कर वृत्ति (उन चिह्नं से लोगों में विश्वास पैदाकर उनसे भिक्षादि लेता हुआ अपनी जीविका) चलाता है, वह ब्रह्मचारी, संन्यासी आदि लिङ्गधारियों के पाप को लेता है तथा (मर कर) तिर्यग्योनि में उत्पन्न होता है।
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