इस (शूद्र) की जैसी आत्मा (कुल-शीलादि = मर्यादा का स्वरूप) हो, जैसा अभीष्ट कर्त्तव्य हो और जैसे इसकी सेवा करनी हो; वैसे अपने को निवेदन (आत्मसमर्पण) कर दे।
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