मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 255
गुरुषु त्वभ्यतीतेषु विना वा तैर्गृहे वसन्‌ । आत्मनो वृत्तिमन्विच्छन्‌ गृह्णीयात्साधुतः सदा ।।
गुरु (माता-पितादि गुरुजन) के स्वर्गवास हो जाने पर या (उनके संन्यास आदि लेने के कारण जीते रहने पर भी) उनसे अलग गृह में रहता हुआ अपनी वृत्ति की इच्छा करता हुआ सर्वदा सज्जनों से भिक्षा को ग्रहण करे।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मनुस्मृति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

मनुस्मृति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें