गुरुषु त्वभ्यतीतेषु विना वा तैर्गृहे वसन् । आत्मनो वृत्तिमन्विच्छन् गृह्णीयात्साधुतः सदा ।।
गुरु (माता-पितादि गुरुजन) के स्वर्गवास हो जाने पर या (उनके संन्यास आदि लेने के कारण जीते रहने पर भी) उनसे अलग गृह में रहता हुआ अपनी वृत्ति की इच्छा करता हुआ सर्वदा सज्जनों से भिक्षा को ग्रहण करे।
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