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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 226
श्रद्धयेष्टं च पूर्त च नित्यं कुर्यादतन्द्रितः । श्रद्धाकृते ह्यक्षये ते भवतः स्वागतैर्धनैः ।।
आलस्य छोड़कर श्रद्धा से इष्ट (मण्डप के भीतर यज्ञादि कार्य) तथा पूर्त (बाबली, कूप, तालाब, प्याऊ आदि) को सदैव करना (बनवाना) चाहिए । न्यायोपार्जित धन से श्रद्धा के साथ किये गये वे दोनों (इष्ट तथा पूर्त) अक्षय (अक्षय मोक्षरूप फल देने वाले) होते हैं।
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