श्रद्धयेष्टं च पूर्त च नित्यं कुर्यादतन्द्रितः । श्रद्धाकृते ह्यक्षये ते भवतः स्वागतैर्धनैः ।।
आलस्य छोड़कर श्रद्धा से इष्ट (मण्डप के भीतर यज्ञादि कार्य) तथा पूर्त (बाबली, कूप, तालाब, प्याऊ आदि) को सदैव करना (बनवाना) चाहिए । न्यायोपार्जित धन से श्रद्धा के साथ किये गये वे दोनों (इष्ट तथा पूर्त) अक्षय (अक्षय मोक्षरूप फल देने वाले) होते हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मनुस्मृति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
मनुस्मृति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।