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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 259
वाच्यर्था नियताः सर्वे वाङ्मूला वाग्विनि:सृता: । तां तु यः स्तेनयेद्वाचं स सर्वस्तेयकृन्नरः ।।
वचन (शब्द) में सब अर्थ निश्चित है और वचन से ही सबका (प्रतीति द्वारा) ज्ञान होता है । जो मनुष्य उस वचन को चुराता (कपटपूर्वक छिपाकर कहता) है, वह सब कुछ का चोर समझा जाता है।
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