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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 261
एकाकी चिन्तयेन्नित्यं विविक्ते हितमात्मनि । एकाकी चिन्तयानो हि परं श्रेयोऽधिगच्छति ।।
(अभीप्सित कर्म तथा धनोपार्जन आदि की चिन्ता को छोड़कर पुत्र से भोजनादि को पाता हुआ) एकान्त स्थान में अकेला ही अपने हित (जीविका ब्रह्मरूप हो जाने) का ध्यान करता रहे; क्योंकि अकेला ही (जीव के ब्राह्मभाव में परिणाम को चिन्तन करता हुआ मनुष्य श्रेष्ठ कल्याण) (मोक्ष) को प्राप्त करता है।
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