सर्वदा सन्तुष्ट होकर इष्ट तथा पूर्त कर्म करे और याचित (किसी के द्वारा याचना किया गया) मनुष्य यथाशक्ति सत्पात्र को प्राप्तकर दानधर्म अवश्य करे।
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