मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 227
दानधर्म निषेवेत नित्यमैष्टिकपौर्तिकम्‌ । परितुष्टेन भावेन पात्रमासाद्य शक्तितः ।।
सर्वदा सन्तुष्ट होकर इष्ट तथा पूर्त कर्म करे और याचित (किसी के द्वारा याचना किया गया) मनुष्य यथाशक्ति सत्पात्र को प्राप्तकर दानधर्म अवश्य करे।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मनुस्मृति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

मनुस्मृति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें