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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 132
उद्वर्तनमपस्नानं विण्मूत्रे रक्तमेव च। श्लेष्मनिष्ठ्यूतवान्तानि नाधितिष्ठेत्तु कामतः ।।
उबटन आदि की मैल, स्नान का पानी, विष्ठा (मैला), मूत्र, रक्त, कफ (खकार), पान आदि की पीक और थूक तथा वमन किये गये अन्नादि पर न ठहरे (पैर न रखे या खड़ा न होवे)।
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