मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 147
वेदमेव जपेन्नित्यं यथाकालमतन्द्रितः । तं ह्यस्याहुः परं धर्ममुपधर्मोऽन्य उच्यते ।।
निरालस होकर यथासमय (मङ्गल कारक होने से नित्यकृत्य के समय) सर्वदा वेद का ही अभ्यास (गायत्री का जप) करे । मनु आदि आचार्यो ने उसी (गायत्री के जप) को श्रेष्ठ धर्म कहा है और दूसरे को उपधर्म कहा है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मनुस्मृति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

मनुस्मृति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें