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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 168
शोणितं यावतः पांसून्त्संगृह्माति महीतलात्‌ । तावतोऽब्दानमुत्रान्यैः शोणितोत्पादकोऽद्यते ।।
(दण्ड़ या खड्ग आदि शस्त्र से क्षत होने के कारण) ब्राह्मण के शरीर से निकला हुआ रक्त पृथ्वी पर से जितने धूलि (के कण-- क्र्यणुक) को ग्रहण करता है, रक्त बहाने वाले उस व्यक्ति को उतने वर्षों तक दूसरे (श्रगाल, कुत्ता, गीध आदि) खाते हैं।
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