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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 158
सर्वलक्षणहीनोऽपि यः सदाचारवान्नरः । श्रहधानोऽनसूयश्च शतं वर्षाणि जीवति ।।
सब लक्षणों से हीन भी जो मनुष्य सदाचारी, श्रद्धालु और असूया (दूसरे के दोष के कहने) से रहित है, वह सौ वर्ष तक जीता है।
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