मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 251
आहृताभ्युद्यतां भिक्षां पुरस्तादप्रचोदिताम्‌ । मेने प्रजापतिर्ग्राह्मामपि दुष्कृतकर्मणः ।।
दान लेने वाले के पास सामने रक्खी हुई, स्वयं (दान लेने वाले के द्वारा) अथवा अन्य किसी के द्वारा प्रेरणा करके नहीं मँगायी गयी और आप (दान लेने वाले) को अमुक वस्तु, अमुक प्रमाण या अमुक समय में दूँगा” इस प्रकार दाता के द्वारा पहले नहीं कही हुई भिक्षा वस्तु (हिरण्य आदि) पापियों (पतित रहित) से भी लेनी चाहिये; ऐसा ब्रह्मा मानते हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मनुस्मृति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

मनुस्मृति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें