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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 217
मृष्यन्ति ये चोपपतिं स्त्रीजितानां च सर्वशः । अनिर्दशं च प््रेतान्नमतुष्टिकरमेव च ।।
जानकारी में जो घर में उपपति (स्री का जार) के रहने को सहन करता है, जो सब बातों में स्री के वश में है; इन दोनों के अन्न को तथा बिना दस दिन बीते सूतक के अन्न को और अतुष्टिकारक अन्न को न खावे।
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