सावित्रान् शान्तिहोमांश्च कुर्यात्पर्वसु नित्यशः । पितृंश्चैवाष्टकास्वर्चेन्नित्यमन्वष्टकासु च ।।
पर्वो (अष्टमी तथा पूर्णिमादि तिथियों) में सर्वदा सावित्रिदेवताक (सावित्री है देवता जिसका ऐसा तथा अनिष्ट निवृत्ति के लिए) शांति हवनों को करे । अग्रहण के बाद कृष्णपक्ष की तीन अष्टमी तिथियों में अष्टकाख्य तथा उसके बाद वाली नवमी तिथियों में अन्वष्टकाख्य श्राद्ध कर्म से (स्वर्गगत) पितरों का अर्चन करे।
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